Story of Ramanujacharya

वैष्णो  के चार प्रमुख संप्रदाय हुए हैं जिनमें से श्री संप्रदाय के आचार्य श्रीपाद  रामानुजाचार्य (ramanujacharya) संप्रदाय के प्रवर्तिका  श्री महालक्ष्मी जी हैं श्री भगवान जब धर्म की स्थापना करने आते हैं तो या तो वे खुद आते हैं या अपने अत्यंत निकट के पार्षदों को भी धर्म की स्थापना करने के लिए के लिए भेजते हैंl

ये जो आचार्य होते हैं  बहुत ही कठिनाइयों का सामना करके सत्य को स्थापित करते है वय्स्नव मत की पुनह प्रतिष्ठा करने वालों में से रामानुजाचार्य का महत्वपूर्ण स्थान हैl

Ramanujacharya
Ramanujacharya

जिनका जन्म सन 1017 इसवी में हुआ था एक राज परिवार से संबंधित उनके माता-पिता का नाम कांति मति और आश्री  केशव थाlउनका बाल्यकाल  उनके जन्म स्थानश्रीपेरुम्दुर में ही बिता  16 वर्ष की आयु में उनका विवाह रक्ष कंबल से हुआ पिता की मृत्यु के उपरांत रामानुजाचार्य कांची चले गए जहां उन्होंने यादव प्रकाश नामक गुरु से वेदाध्यन्न प्रारंभ किया यादव प्रकाश की वेदांत टीकाएँ  शंकराचार्य के भाष्य से प्रेरित हैl 

Shri ramanujacharya की बुद्धि इतनी अधिक विस्तृत थी की अपने गुरु से भी अधिक व्याख्या कर दिया करते थे इनका ज्ञान इतना बढ़ गया कि उनके गुरु के लिए इनके तर्क को पार कर पाना अत्यंत कठिन हो गया था रामानुज की व्याख्याता की ख्याति इतना निरंतर बढ़ती गई इसको देख कर इनके गुरु यादव प्रकाश भी  इनके शिष्य बन गए रामानंद द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत विशिष्टा द्वैत  कहलाता हैl श्री राम आचार्य बड़ी ही विद्वान सदाचारी धैर्यवान और उदार थेl

चरित्र बल  और भक्ति में तो यह अद्वितीय थे  श्री रामानुजाचार्य कांचीपुरम रहते थे वे वहाँ श्री वरदराज भगवन की पूजा करते थेl कांचीपुरम से  दक्षिण पश्चिम में 300 किलोमीटर दूर है तट पर पवित्र श्रीरंगम तिरुचिरापल्ली है वहाँ के मठाधीश संत श्री यमुनाचार्य थे जब श्री यामुनाचार्य की मृत्यु निकट थी तो उन्होंने अपने शिष्य के द्वारा श्री रामानुजाचार्य को अपने पास में बुलाया  किंतु इनके पहुंचने के पूर्व प्राचार्य की मृत्यु हो गईl

अश्रुपूरित नेत्रों और भावपूर्ण ह्रदय के साथ वहां पहुंचने पर रामानुजाचार्य ने देखा की श्री यमुनाचारी  के दाहिने हाथ की तिन उंगलियांमुड़ी हुई थी  उपस्थित सभी शिष्यों  ने इस रहस्य को जानना चाहा श्री रामानुजाचार्य समझ गया कि श्री यमुनाचार्य इसके माध्यम से कुछ कहना चाहते हैं उन्होंने उच्च स्वर में अज्ञान मोहित जनों को नारायण के चरण कमलों की अमृत वर्षा और शरणागति में लगाकर सर्वदा निर्विसेश्वाद से उनकी रक्षा करता रहूंगाl  

उनके इतना कहते ही एक उंगली  खुल गईl रामानुज ने फिर कहा मैं लोगों की रक्षा हेतु समस्त अर्थों का संग्रह कर मंगलमय परम तत्व ज्ञान प्रतिपादक श्रीभाष्य की रचना करूंगाl इतना कहते ही उनकी दूसरी उंगली खोलकर सीधी हो गई रामानुज फिर बोले जिन पराशर मुनि लोगों के प्रति जिव इस्वर उनका स्वभाव तथा उन्नति का उपाय स्पस्ट रूप से समझाते हुए विष्णु पुराण की रचना की है उनका ऋण को उतरने के लिए मैं किसी दक्ष एवं महान भक्त शिष्य को उनका नाम दूंगा इतना कहते ही अंतिम उंगली भी खुल गईl

यह देख कर सब लोग बड़े आश्चर्यचकित हुए किसी को संदेह नहीं हुआ की युवक श्रीयामुनाचार्य का आसन ग्रहण करेगा श्री रामानुजाचार्य सूत्र विष्णु सहस्त्रनाम ऑरलबन्दारों के दिव्य प्रबंधन की टीका कर यमुनाचार्य को दिए गए 3 वचनों को पूरा किया श्री रामानुजाचार्य गृहस्थ थे किन्तु जब इन्होने देखा की अपने उद्देश्य को पूरा करना कठिन है तब इन्होंने गृहस्थ आश्रम को त्याग कियाl

 फिर श्रीरंगम जाकर सन्यास धर्म दीक्षा ली लिया यादव प्रकाश को अपने पूर्व करनी पर बहुत पश्चताप हुआ और वे भी सन्यास की दीक्षा लेकर श्रीरंगम चले आए और श्री रामानुजाचार्य की सेवा में रहने लगे आगे चलकर उन्होंने गोष्ठी पूर्ण से उन्होंने शिक्षा ली जो परम धार्मिक विद्वान थे उनसे दीक्षा और मंत्र प्राप्त करने के लिए श्री रामानुजाचार्य को 18 बार लौटाए जाने के बाद गोष्ठी पूर्ण ने उनको अस्ताक्षर  नारायण मंत्र ओम नमो नारायणाय का उपदेश देकर समझायाl

वत्स यह परम पवन मंत्र जिसके कानों में पड़ जाता है समस्त पापों से छूट जाता है मरने पर वह भगवान नारायण के बैकुंठ धाम जाता है यह अत्यंत गुप्त मंत्र है इसे किसी भी अयोग्य को मत सुननाlक्योंकि वह इसका आदर नहीं करेगा गुरु का निर्देश था की रामानुज उनका बताया हुआ मंत्र किसी अन्य को न बताएं लेकिन जब रामानुज को ज्ञात हुआ कि मंत्र के सुनने से लोगों को मुक्ति मिल जाती हैl

तो वह मंदिर की छत पर चढ़कर सैकड़ों नर नारियों के सामने चिल्ला चिल्ला कर उस मंत्र का उच्चारण करने लगे यह देखकर क्रोधित गुरु ने इन्हें का श्राप दे दिया की तुम नरक जाने का श्राप दे दिया रामानंद ने यह सुनकर जबाब दिया की अगर मेरे नरक जाने से हजारों नर नारियों की मुक्ति हो जाए तो मुझे नरक जाना भी स्वीकार हैl रामानुजाचार्य 120 वर्ष की आयु तक श्रीरंगम में रहे वृद्धावस्था में भगवान श्री रंगनाथ जी से देह त्याग की अनुमति लेकर अपने शिष्यों के समक्ष अपने देहावसान की इच्छा की घोषणा कीl

  घोषणा के बाद  सभी उनके चरण कमल पकड़कर अपने इस निर्णय का परित्याग करने की याचना करने लगे इसके 3 दिन पश्चात श्री रामानुजाचार्य शिष्यों को अपने अंतिम निर्देश देकर इस भौतिक जगत से वैकुंठ को प्रस्थान कर गए उन्होंने शिष्यों को 64 निर्देश दिएl

परंतु उनमें से दो अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो श्री चैतन्य महाप्रभु ने शिकार किए वैष्णव सेवा तथा शुद्ध भक्ति हमको हरि नाम रुचि उत्पन्न होती है आध्यात्मिक प्रगति होती है आदेश का हमे पालन करने का प्रयास करना चाहिए जब हम खुद के लिए आध्यात्मिक प्रगति प्रगति चाहते है तो हमें इसका पालन करना चाहिए जब हम अपने शुद्धिकरण के लिए आध्यात्मिक प्रगति हेतु उन्हें स्मरण करें उनका गुणगान करें तो भगवन की सेवा में पूरी तरह से समर्पित हो जायेl  

Conclusion:

मैं आपसे यही बोल सकता हूं कि हमारी बताई हुई जानकारी (ramanujacharya and ramanujacharya teachings ) आपको बहुत ही अच्छी लगी होगी

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