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chandrashekhar azad freedom fighter story

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chandrashekhar azad freedom fighter :

“हैं लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा है और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर, खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है सरफरोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजुएँ कातिल में हैl

जी हाँ आज हम एक ऐसे क्रन्तिकारी वीर के बारे में बात कर रहे हैं जिसने जो कसम खाई उसे निभाया भी एक सदी पहले की बात है जब देश गुलामी की जंजीरों में पूरी तरह से जकड़ा हुआ 1857 के क्रांति के बाद देश में धीरे धीरे आजादी के लिए चिंगारी फुट रही थीl

chandrashekhar azad का बचपन



chandrashekhar azad freedom fighter

उसी समय भारत के मध्य प्रदेश के एक गाँव भवरा में एक बच्चे ने 23 जुलाई 1906 को जन्म हुआ तब किसे पता था की यह बच्चा इतने कम उम्र में कुछ ऐसा कर जायेगा की इतिहास कभी इसे भूल नहीं पायेगाl इस दिन जिस बच्चे का जन्म हुआ उसका नाम था चंद्रशेखर तिवारी पिता सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी थाl

ये बचपन से ही पढाई में काफी तेज थे उसके साथ तगड़ा शारीर होने की वजह से खेल कूद में काफी मन लगता था उनको पहलवानी करना काफी पसंद थाl शास्त्र और शस्त्र दोनों में वो काफी कुशल थे हथियार चलाने  भी ओ काफी तेज थे यही कारन था की वो बचपन से ही स्वाभिमानी और विद्रोही विचारधारा के थेl

chandrashekhar azad
chandrashekhar azad

chandrashekhar azad freedom fighter struggle days



chandrashekhar azad freedom fighter

उनको गुलामी भिल्कुल भी पसंद नहीं थी उस समय के अंग्रेजी शासन के द्वारा 1919 में अमृतसर में  जलीय वाला बैग हत्या कांड से काफी आहत हुएl सन 1921 में गाँधी जी द्वारा कराए गए असहयोग आन्दोलन में चंद्रशेखर आजाद ने एक करांतिकारी के रूप में भाग लिया कशी के संस्कृत विद्यालय के सभी विद्यार्थी असहयोग आंदोंलन का हिस्सा बने और धरने पर बैठ गएl

पुलिश ने सभी को पकड लिया सभी बच्चो में chandrashekhar azad सबसे कम उम्र के थेl अंग्रेजी हुकूमत ने फैसला किया की इस बच्चे की उम्र कम कम है इस लिए इससे माफ़ी मंगवाकर छोड़ दिया जायेगा लेकिन चंद्रशेखर तिवारी ने माफ़ी मांगने से इंकार कर दिया तब ये फैसला सुनाया गया की इसको 15 बेतों की सजा डी जाएगीl

ओ भी आम डंडा नहीं रहता था एक लकड़ी के डंडे को पूरी रत पानी में भिगो कर रखा जाता था और उसी डंडे से नंगा कर के मारा जाता था वैसे ही चंद्रशेखर को भी मारा गया जिससे की शारीर का चमड़ा भी छिल जाता था फिर भी chandrashekhar azad ने भारत माता की जय और वंदेमातरम् बोलना नहीं छोड़ा जब उनसे उनका नाम पूछा जाता तो वे अपना नाम आजाद बताते थेl

महत्मा गाँधी असहयोग आन्दोलन को अहिंसा का आन्दोलन कहा था लेकिन इन सब घटनाओ से आहत होकर गोरखपुर (UP) के चौरा चौरी गावों में पुलिस की बर्बरता से तंग आकर पुरे ग्रामीणों ने पुलिश थाने का घेराव किया और ठाणे में आग लगा दी जिसमें 23 पुलिस जल गए जो गाँधी जी को अच्चा नहीं लगा और वे असहयोग आन्दोलन को ख़त्म करने का ऐलान कियाl

पुरे देश को ये समझ में नहीं आया की जब देश के लोग आजादी के लिए जन तक देने को तैयार हैं तब गाँधी जी ने ऐसा फैसला क्यों लियाl वहीँ चौरा चौरी घटना का भी अच्छे ढंग से इंसाफ नहीं हुआ इंसाफ के नाम पर लोगों का दमन ही किया गया इस कांड में 228 लोगों को गिरफ्तार किया गया थाl

जिसमे की 6 लोग पुलिस की कस्टडी में ही मरे गए और 172 लोगों को फंसी पर चदा दिया गयाl अंग्रेजो ने बहुत सारा अत्यचार किया महिलायों को भी नहीं छोड़ा इस से बहुत से युवा गाँधी जी के फैसले से नाराज हुए और उनकी अहिन्सा की पार्टी को छोड़ दिया उनमे से ही एक नाम था चंद्रशेखर उस समय लोग चंद्रशेखर को आजाद के नाम से ही जानने लगे थेl

उनको ये एक नया नाम मिल चूका थाl क्या आप जानते हैं आजाद को उनके पार्टी के लोग पंडित जी कहा करते थे चंद्रशेखर तिवारी काफी गरीब परिवार के थे जिनके घर में खाने की भी परेशानी थी आजाद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के काफी करीबी थे पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने बहुत ज्यादा जिम्मेदारी दे डाली थी आजाद के लिए संगठन के लिए धन जुटाना भी एक बड़ा चैलेंज थाl

क्रातिकारी दल को हथियार और समान जुटाने के लिए धन की बहुत ज्यादा आवश्यकता थी जिसको पूरा करने के लिए 9 अगस्त 1925 को काकोरी में एक निर्भीक ट्रेन डकैती को अंजाम दिया जिसमे पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, chandrashekhar azad , और असफाक उल्ला खां इत्यादि 10 लोग शामिल थेl इस घटना को अंजाम देने के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने बिस्मिल, असफाक उल्ला, रौशन सिंह और राजेंद्र लहरी को फंसी की सजा दे दी गईl

जबकि आजाद को किसी ने पहचाना ही नहीं आजाद ने बहुत कोशिस की अपने शाथियों को बचाने की लेकिन कामयाब नहीं हुए अब अंग्रेजी सरकार के नजर में आजाद खटकने लगे उसी समय उनकी मुलाकात एक और वीर क्रन्तिकारी भगत सिंह से हुई और फिर क्या था दोनों एक साथ एक ही रास्ते पर चल दिए इनके साथ एक और क्रन्तिकारी जुड़ जाएl

जिनका नाम राजगुरु chandrashekhar azad के नेतृत्व में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को देल्ही केन्द्रीय असेम्बली में बम विस्फोट किया यह विस्फोट अंग्रेजो द्वारा बनाये गए काले कानून के विरोध में था इस घटना से अंग्रेजी हुकूमत में अफरा तफरी पैदा कर दियाl

उसके बाद भगत सिंह औए बटुकेश्वर दत्त ने आजाद के मर्जी के खिलफ खुद को गिरफ्तार करवा लिया इतिहासकारों की माने तो भगत सिंह और उनके साथियों के फांसी रुकवाने के लिए एक दुर्गा नाम की महिला को गाँधी जी के पास भेजा लेकिन वहाँ से उनको कोई जवाब नहीं मिलाl

इसके बाद वह उतर प्रदेश के हरदोई के जेल में जाकर गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले उनसे मिलने के बाद वे इलाहबाद गए और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनंद भवन में जाकर मिले आजाद ने नेहरू से कहा की वह गाँधी जी पर ये जोर डाले की उन तीनो को फंसी न देकर उनकी सजा उम्रकैद में बदल दिया जायेl

इसके बाद आजाद 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में अपने साथी सुखदेव राज से आगे के रणनीति के बारे में बात कर रहे थे की तभी एक मुखबिर के सुचना के अधर पर डिप्टी S.P ठाकुर विश्वेश्वर सिंह और पुलिस अधीक्षक सर जों नोड बावर ने पुरे पार्क को घेर लिया पुलिस ने उनके ऊपर गोलियां चलाना शुरू कर दी पर chandrashekhar azad ने बहादुरी से लड़ते हुए अपने साथियों को वहाँ से भगाने में सफल रहे इस गोलीबारी में आजाद ने तिन पुलिस को मर गिराया थाl

उनसे लड़ते समय वो पूरी तरह से घायल हो गए थे और उनकी गोलियां भी ख़त्म हो चुकी थी उन्होंने अपनी आखरी गोली को अपने सर में मार लिया और शहीद हो गए उन्होंने जीते जी पुलिस के द्वारा न पकडे जाने की कसम को भी निभाया अगर गोलियां ख़त्म न हुई होती तो शायद पंडित जी इतने जल्दी शहीद न हुए होते

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chandrashekhar azad रहस्यमई मृत्यु



chandrashekhar azad freedom fighter

आजाद के मौत से जुडी एक गोपनीय फ़ाइल् आज भी लखनऊ के C.I.D आफिस में राखी हुई है जिसमे उनके मौत से जुडी महत्वपूर्ण बाते दर्ज हैं जिसे सार्वजानिक करने से मना कर दिया गया हैl लेकिन आजाद के साथी रहे व्यस्पन ने अपने एक किताब अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद में नोट बार्बर का प्रेस को दिया गया बयान में नोट बार्बर ने कहा की जब मै खाना खा रहा था तब एक बड़े नेता का मैसेज आयाl

उसने खा की आप जिसकी तलास कर रहे है वह इस समय अल्फरेड पार्क में है और वह वहाँ पर 3 बजे तक रहेगा उस समय वो कुछ समझा नहीं और तुरंत आन्नद भवन गया वहा जाने के बाद नेहरू ने बताया की आजाद अभी मेरे यहाँ आया था वो अपने साथियों के संग रूस जाने के लिए 1200 रूपए मांग रहा था यहाँ से भागने की तैयारी में हैl

मैंने उसे अल्फरेड पार्क में बैठने के लिए कहा है फिर मैं बिना देरी किए पार्क को घेर लिया और आजाद को आत्म समर्पण करने को कहा लेकिन हमारे एक सिपाही को मर दिया फिर मैंने भी गोली चलाने का हुक्म दिया 5 गोली से आजाद ने हमारे पांच लोगो को मारा फिर छठी गोली अपने कांपती पर मार लीl

एक इन्टरव्यू में आजाद के भतीजे सुरजीत आजाद ने बताया की जवाहरलाल नेहरु ने ही अंग्रेजो को आजाद के बारे में बताया की वो इस समय कहाँ है इस बारे में संघ के प्रान्त प्रचार प्रमुख अजय मितल का भी कहना है की नेहरू के ज़माने में धर्मेन्द्र गॉड नाम का एक गुप्तचर अधिकारी थेl

उन्होंने रिटायर होने के बाद अपनी किसी एक किताब में लिखा था की जिस दिन आजाद की मृत्यु हुई उस दिन वो नेहरू से मिलने आंनंद भवन आये थे दोनों के भी किसी बात को लेकर बहस हुई उसके बाद आजाद वहाँ से चले गएl

वाही दूसरी तरफ नवभारत टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुशार आजाद पहले कानपूर गणेश शंकर विद्यार्थी जी के पास गए फिर वहाँ तय हुआ की इस्तालिन की मदत ली जाए क्योकि उसी ने आजाद को रूस बुलाया था उनको रूस जाने के लिए 1200 रुपये की जरुरत थी जो उनके पास नहीं थेl

chandrashekhar azad ने प्रस्ताव रखा की क्यों न नेहरू से पैसे मांगे जाएँ इस प्रस्ताव का सभी ने विरोध किया और कहा की नेहरु तो अंग्रेजो का दलाल है लेकिन आजाद ने कहा की कुछ भी हो लेकिन उसके साइन में भी तो एक भारतीय का दिल है वो मना नहीं करेगा फिर आजाद अकेले ही कानपूर से इलाहाबद आ गए और आनंद भाव गए उनको सामने देख कर नेहरु चौक गए

आजाद ने नेहरू को बताया की हम सब रूस जाना चाहते है क्योकि स्टॅलिन ने मदत करने के लिए बुलाया हैl पहले नेहरू गुस्सा हुए फिर तुरंत ही मन गए और कहा की तुम अल्फरेड पार्क में बैठो मेरा आदमी 3 बजे तुम्हें वहाँ पैसे देने आ जायेगाl

final words



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